हकीकत तो यह थी कि इंतज़ार तो मिस्टर आशीष राणे भी कर रहे थे, लेकिन अपनी रिहाई का. पंकज की नज़रें अब भी जवाब तलाश रही थी, लेकिन स्कूल में अचानक पसरा सन्नाटा अशांत कर रहा था, यह वो मंज़र था जब नौ साल का पंकज, बेचैनी, खौफ, दहशत या फिर किसी भी तरह के डर से सही मायने में वाकिफ नहीं था...
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