पूर्णा क्यों उदास थी, वह इसे कमलाप्रसाद से न कह सकी। उसे इस समय वसंत कुमार की याद न थी, अधर्म की शंका न थी, बल्कि कमलाप्रसाद के प्रगाढ़ आलिंगन में मग्न इस समय उसे यह शंका हो रही थी कि इस प्रणय का अंत भी क्या वैसा ही भयंकर होगा? निर्मम विधि लीला फिर उसका सुख-स्वप्न तो न भंग कर देगी। वह दृश्य उसकी आँखों में फिर गया, जब पहले-पहल उसके स्वामी ने उसे गले लगाया था। उस समय उसका हृदय कितना निशंक, कितनी उमंगों से भरा हुआ था, पर इस समय उमंगों की जगह शंकाएँ थीं, बाधाएँ थीं।

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