इस ग्यारहवें साल की मीठी मधुर कल्पना ने ज़रा न गुदगुदाया होगा, उसके लिए तो शादी बस शादी है, मिली है न मुफ्त में एक काम करने वाली! रह रह कर पारा चढ़ रहा था, जैसे-जैसे गैस पर चाय उफान मार रही थी। इधर मनन नहा धो तुलसी चौरे के पास बने चबूतरे पर विराजित हो, अखबार देखने लगे...
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