अब छुप छुप कर रोने से भी क्या फ़ायदा !लक्ष्मी  उदास क़दमों से चल कर आई और मधु के हाथ भेजी दीपंकर की चिट्ठी को दुहरा दुहरा और तिहरा तिहरा कर पढ़ने लगी. " लक्ष्मी ! जो तुमने किया वह एक स्त्री के लिए तो सामाजिक अपराध से काम नहीं. बस आगे क्या कहूँ ! मैं तुम्हे स्वेच्छा से मुक्त करता हूँ। तुम जब चाहो, जहां चाहो जिस किसी के भी पास जाना चाहो." 
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